Monday, 27 December 2021

परछाई


वो परछाई मेरे कल को, मेरे आज से कई बार मिलाती है

वो हकीकत से वाकिफ कराती है, कभी कैफियत सुनाती है ।


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इत्तफ़ाक

नज़रों से जरा सा हम दूर क्या हुए  वो तो नजरंदाज करने लगे । हमें तवज्जू की तो आरज़ू न थी  वो इत्तफाक़ से भी मुकरने लगे ।